मारिना अब्रामोविच का Rhythm 0 और हमारी चुप्पी की क्रूरता
1974 में, इटली के नेपल्स शहर की एक आर्ट गैलरी में, परफॉर्मेंस आर्टिस्ट मारिना अब्रामोविच ने ऐसा प्रयोग किया जिसके लिए न दर्शक तैयार थे, न शायद वे खुद।
वह मंच पर आईं और पूरी तरह स्थिर खड़ी हो गईं।
चुप।
निःस्पंद।
बिना किसी प्रतिक्रिया के।
उनके पास एक मेज़ रखी थी, जिस पर 72 वस्तुएँ थीं।
कुछ बिल्कुल निर्दोष—गुलाब, इत्र, ब्रेड।
और कुछ बेहद खतरनाक—कैंची, ज़ंजीरें, स्कैल्पेल… और एक भरी हुई बंदूक।
मेज़ के सामने एक बोर्ड लगा था, जिस पर लिखा था:
“आप मुझ पर किसी भी वस्तु का उपयोग कर सकते हैं।
मैं विरोध नहीं करूँगी।
इसकी पूरी ज़िम्मेदारी मेरी होगी।”
एक इंसान से वस्तु बनने तक
अगले छह घंटों तक मारिना ने खुद को एक इंसान नहीं, बल्कि एक वस्तु बना दिया।
शुरुआत में सब कुछ सभ्य था।
किसी ने उनके हाथ में फूल रखा।
किसी ने गाल पर चूमा।
किसी ने उन्हें स्नेह से देखा।
फिर कुछ बदला।
धीरे-धीरे भीड़ का व्यवहार कठोर होने लगा।
उनके कपड़े काट दिए गए।
काँटों से उनकी त्वचा छिली।
खून दिखाई देने लगा।
और उसी क्षण, लोग उन्हें इंसान की तरह देखना बंद कर चुके थे।
जब ज़िम्मेदारी हटा दी जाती है
एक व्यक्ति ने सिर्फ खून बहते देखने के लिए उनकी गर्दन काटी।
दूसरे ने बंदूक उठाई, उसे मारिना के हाथ में रखा और उनकी ही ओर तान दिया।
कुछ दर्शकों ने हस्तक्षेप किया, ताकि बात इससे आगे न बढ़े।
मारिना ने कुछ नहीं किया।
न वह रोईं।
न हिलीं।
न विरोध किया।
उन्होंने भीड़ को तय करने दिया कि वे कितनी दूर तक जा सकते हैं।
प्रयोग का अंत, सच्चाई की शुरुआत
जब छह घंटे पूरे हुए, मारिना आगे बढ़ीं।
ज़िंदा।
लहूलुहान।
फिर से एक इंसान।
और उसी पल, भीड़ टूट गई।
लोग भागने लगे।
नज़रें चुराने लगे।
किसी में हिम्मत नहीं थी कि वे उस इंसान को देखें, जिसे उन्होंने अभी-अभी वस्तु समझकर नुकसान पहुँचाया था।
Rhythm 0 क्या साबित करता है?
यह परफॉर्मेंस दोबारा कभी नहीं दोहराया गया।
इसलिए नहीं कि यह असफल था, बल्कि इसलिए क्योंकि यह बहुत सफल था।
इसने एक डरावनी सच्चाई उजागर की:
- जब ज़िम्मेदारी हटा दी जाती है,
- जब अनुमति दे दी जाती है,
- जब सामने वाला चुप रहता है,
तो आम लोग भी असाधारण क्रूरता कर सकते हैं।
हिंसा के लिए हमेशा राक्षसों की ज़रूरत नहीं होती।
कभी-कभी सिर्फ चुप्पी काफी होती है।
आख़िरी बात
Rhythm 0 सिर्फ एक आर्ट परफॉर्मेंस नहीं था।
यह समाज का आईना था।
और आईना सबसे ज़्यादा डरावना तब होता है,
जब उसमें हमें अपना ही चेहरा दिखता है।